September 5, 2026

डॉ आशुतोष की कलम से जब जंगल किताब बन जाए। ऐसी ही कथा है यक्षिणी।

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कोरिया जिले के घने जंगलों में तैनात एक अफसर – फाइलों, बैठकों और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को निभाने के बाद – अपने निजी समय में चुपचाप कुछ और भी कर रहा था लगातार । वह मैकल के उन वनों को शब्द दे रहा था, जिन्हें सदियों से किसी की प्रतीक्षा थी। लगभग 5 साल। अनवरत। बिना रुके। और अब वह कथा पाठकों के सामने है।

डॉ. आशुतोष चतुर्वेदी – डीएसपी, डिप्टी कलेक्टर, एसडीएम, नगर निगम कमिश्नर जैसे पदों पर काम कर चुके और वर्तमान में कोरिया जिले में जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी के रूप में पदस्थ हैं – ने अपना पहला उपन्यास लिखा है।

नाम है – ‘यक्षिणी: मैकल की अनुगूँज।’

आशुतोष जी का साहित्य के प्रति गहरा अनुराग पारिवारिक पृष्ठभूमि से ही रहा है। और हिंदी, संस्कृत की सुदीर्घ शब्दावली उन्हें विरासत में मिली है। समय – समय पर पत्र पत्रिकाओं में उनके लेख छपते रहे हैं। साथ ही कई मंचों पर वे आमंत्रित वक्ता, साहित्यकार के रूप में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कर चुके हैं। पर एक लेखक के रूप में यह उनकी पहली प्रकाशित कृति है।

यह रचना अपने भीतर मैकल के रहस्य, आध्यात्मिकता और लोककथाएं समेटे हुए है। मैकल के उन घने वनों में, जहाँ खड़ी दोपहर में भी अँधेरा रहता है – जहाँ पेड़ों की जड़ों में न जाने कितनी पुरानी कहानियाँ दबी पड़ी हैं – वहाँ एक रहस्यमयी तालाब है। पर वह हर किसी को दिखता नहीं। कहते हैं, जो लालच लेकर आया – वह खाली हाथ लौटा। और जो श्रद्धा और विस्मय लेकर आया – उसे उस जल की गहराई में एक स्वर्णिम आभा दिखी, एक ऐसी उपस्थिति जो सदियों से किसी की प्रतीक्षा कर रही थी।

पूर्णिमा की रातों में उस तालाब के पास चंपा की सुगंध फैल जाती है – जबकि वहाँ चंपा का कोई वृक्ष नहीं। पुराने लोग धीमी आवाज़ में कहते हैं – “वह इस जंगल की यक्षिणी है।” और यह भी कहते हैं – “उसकी प्रतीक्षा अभी समाप्त नहीं हुई।”

यही वह संसार है जिसे डॉ. आशुतोष चतुर्वेदी ने अपनी कलम से जीवित किया है। यह उपन्यास चार खंडों में विभाजित है – बीज, अंकुरण, अनुगूँज और अंतर्ध्वनि – जो ठीक वैसे विकसित होता है जैसे कोई अरण्य धीरे-धीरे अपना वैभव पाता है। रतनपुर की प्राचीन राजधानी से लेकर अमरकंटक के तपस्थलों तक, चांगभखार की अनछुई छटा से लेकर रामगढ़ की रहस्यमयी पहाड़ियों तक – इसमें स्थानीय भूगोल, जनश्रुतियों, ऐतिहासिक स्थलों और सांस्कृतिक विरासत को अत्यंत प्रामाणिकता के साथ कथानक में पिरोया गया है।

पढ़ते-पढ़ते लगता है – समय धीमा पड़ गया है। नीचे नम मिट्टी है, चेहरे पर ठंडी हवा है, ऊपर घना आसमान है। और दूर कहीं, कोई आपका नाम ले रहा है।

यह आश्चर्यजनक है कि यह उनका पहला प्रकाशित उपन्यास है, क्योंकि इसकी भाषा, कथानक और वर्णन शैली किसी अनुभवी साहित्यकार की परिपक्वता का परिचय देती है।

यह कथा समाप्त नहीं हुई। यह केवल प्रतीक्षा में है। और अब – आपकी बारी है।

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