September 14, 2026

डॉ सी. वी. रमन विश्वविद्यालय में लोक में राम की अनुपम छटा कला और संस्कृति मनुष्य को मनुष्य बनाती है- संतोष चौबे देश -विदेश में कोटा की पहचान डॉ सी वी रमन विश्वविद्यालय से है- अटल श्रीवास्तव

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बिलासपुर। विश्वविद्यालय में आयोजित रमन लोक कला महोत्सव 2026 – लोक में राम के तीसरे दिन पूरा परिसर रामनामी समुदाय के राम भजनों से भक्तिमय हो उठा। देश के विभिन्न राज्यों से आए कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से भगवान राम के जीवन को सजीव कर दिया।
असम से आईं सविता साइकिया एवं साथियों ने अंकिया नाट की प्रभावशाली प्रस्तुति दी। उड़ीसा से आए ध्यानानंद पंडा और दल ने सिंगारी नृत्य से दर्शकों का मन मोह लिया। रायपुर से आईं ममता अहर ने ‘वैदेही’ शीर्षक से एकल अभिनय प्रस्तुत किया। वहीं सरायकेला से आए रंजीत आचार्य एवं उनके साथियों ने छऊ नृत्य की अद्भुत छटा बिखेरी। छत्तीसगढ़ की धरती पर देशभर से आए कलाकारों ने लोक में राम की परंपरा को जीवंत रूप दिया।
विश्वविद्यालय के कुलाधिपति संतोष चौबे ने कहा कि कला और संस्कृति मानुषया को मानुषया बनाए रखती है उन्होंने कहा की यही करण है की हमने कला और संस्कृति के लिए विश्व रंग जैसे आयोजन किए हैं ,ताकि भारतीय भाषाओं को भारतीय जीवन शैली को भारतीय कला संस्कृति को वैश्वीक मंच पर स्थापित किया जा सके। उन्होंने कहा की विश्व रंग में 60 से अधिक देश शामिल हैं। उन्होंने आईसेक्ट ग्रुप द्वारा तकनीकी शिक्षा ,कौशल, रोजगार ,उद्यमिता ,और भाषा के क्षेत्र में किया जा रहे काम को विस्तार से सबके सामने रखा।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित कोटा विधानसभा के विधायक अटल श्रीवास्तव ने कहा कि पहले डॉक्टर सीवी रमन विश्वाविद्यालय की पहचान कोटा क्षेत्र के कारण होती थी। अब कोटा की पहचान डॉ सीवी रमन विश्वाविद्यालय के कारण होती है। कोटा की धरती पर देश की विविध लोक परंपराओं का संगम होना गौरव की बात है। इससे सांस्कृतिक एकता मजबूत होती है। उन्होंने कहा की कोटा के विकास में डॉ सीवी रमन विश्वाविद्यालय का महत्वपूर्ण योगदन है।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर प्रदीप कुमार घोष ने कहा कि कला संस्कृति जीवन का अभिन्न अंग होता है और हमें इसे ही ऊर्जा मिलती है वर्तमान समय में देश अपनी कल और संस्कृति को सहज ने और उसे समृद्ध करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। हम सबको अपनी संस्कृति और कला पर गर्व होना चाहिए । विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. अरविंद कुमार तिवारी ने कहा कि अगले वर्ष या आयोजन वैश्विक आयोजन के रूप में आप सभी के सामने होगा उन्होंने सभी का आभार प्रकट किया इस अवसर पर विश्वविद्यालय की संकुलपति डॉ जयति चटर्जी, उपस्थित रही। कार्यक्रम का संचालन डॉ ज्योति बाला गुप्ता ने किया। आईएस अवसर पर बड़ी संख्या में प्राध्यापक विद्यार्थी और कला प्रेमी उपस्थित रहे।

छत्तीसगढ़ी संस्कृति के राजदूत हैं छत्तीसगढ़िया प्रवासी – डॉ. अरविंद तिवारी

रमन लोक कला महोत्सव के अंतर्गत विश्वभर में रह रहे छत्तीसगढ़िया प्रवासियों के साथ संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम वर्चुअल मंच पर संपन्न हुआ, जिसमें 26 देशों से लोगों ने सहभागिता की। सभी ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति, भाषा और परंपराएँ आज विश्व पटल पर अपनी पहचान बना रही हैं।
अर्जेंटीना में रह रहीं शोभा मंढरिया ने कहा कि व्यस्त जीवन के बीच भी वे अपने घर और दिनचर्या में छत्तीसगढ़िया संस्कृति को जीवित रखे हुए हैं, यही उनकी संतुष्टि का आधार है। लंदन में रह रहे मनीष तिवारी ने कहा कि हम कहीं भी रहें, अपनी माटी, गांव और राज्य हमेशा दिल में बसते हैं।
नीदरलैंड में रह रहे जांजगीर के मनीष पांडे ने छत्तीसगढ़ी साहित्य, भाषा और पठन-पाठन पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि विदेश में रहकर अपनी संस्कृति और भी अधिक याद आती है। न्यूयॉर्क में निवासरत विभाश्री साहू ने अपनी कविता सुनाते हुए वसुधैव कुटुंबकम की भावना को आत्मसात करने पर जोर दिया.।शोभा मढ़रिया अर्जेंटीना,
विभाश्री साहू अमेरिका,मनीष तिवारी इंग्लैंड, मनीष पांडेय नीदरलैंड , नीलचंद महामल्ला नागपुर ,तरुण साहू ढेकियाजुली असम , शंकर साहू डिब्रूगढ़ असम पुरन्दर सिंह टाटानगर झारखंड कार्यक्रम में शामिल हुए।
कार्यक्रम का संयोजन वरिष्ठ संस्कृति एवं संग्रहालय विशेषज्ञ अशोक तिवारी ने किया तथा संचालन डॉ. शालिनी पांडे ने किया। इस अवसर पर कुलसचिव डॉ. अरविंद कुमार तिवारी ने कहा कि बाहर रहकर भी छत्तीसगढ़ी संस्कृति को संजोए रखने वाले सभी प्रवासी वास्तव में हमारी भाषा और संस्कृति के राजदूत हैं।

*वर्तमान समय में भाषा की चुनौतियाँ*
प्रथम वक्ता वरिष्ठ भाषाशास्त्री डॉ. सुधीर शर्मा (रायपुर) ने कहा कि हर काल में भाषा को चुनौतियाँ मिली हैं, पर इंटरनेट और वैश्वीकरण के दौर में अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव से हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाएँ प्रभावित हो रही हैं। रोमन लिपि का बढ़ता प्रयोग एक गंभीर सांस्कृतिक प्रश्न है, जिसे समाज धीरे-धीरे स्वीकार करता जा रहा है।
द्वितीय वक्ता प्रोफेसर चितरंजन कर ने कहा कि भाषा परंपरागत धरोहर है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है। मनुष्य ने भाषा को नहीं गढ़ा, बल्कि भाषा ने मनुष्य को गढ़ा है। संवाद से ही समाधान निकलता है, इसलिए मातृभाषा का सम्मान आवश्यक है। तकनीक का उपयोग ज्ञान देने के लिए होना चाहिए, केवल सूचना के लिए नहीं।
तृतीय वक्ता डॉ. विश्वासी एक्का (अंबिकापुर) ने कहा कि भाषा वह सुसंगठित माध्यम है, जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करता है। हमारी भाषाओं में लोकगीत, लोकोक्तियाँ और परंपराएँ समृद्ध रूप से मौजूद हैं। भाषा को अत्यधिक शुद्धतावादी बनाने के बजाय सरल, स्पष्ट और प्रेम बढ़ाने वाला माध्यम होना चाहिए। शब्दों का उपयोग किस प्रकार करना है, यह मनुष्य पर निर्भर करता है।

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